बनारस को मेरी याद दिलाना
मेरे परदेशी दोस्त !
हर उस ठाव पर जाना
जहाँ हमने कवितायें पढी
बहसें कीं, गीत गुनगुनाएं
जीवन के शतरंगों से बुने
ताजा और जीवंत वे क्षण
तुमसे हाथ मिलायेंगे.
उस पुरातन शहर के
एक और रस से
तुम्हारा परिचय करवाएंगे.
धरती के एक हिस्से पर
अपनी सभी हरी शाखों के साथ
तने खड़े पेड़ की जड़ें
कितनी गहरी और दूरस्थ हैं
इसकी झलक दिखलायेंगे.
अपनी लहरीली तीव्रता के विरुद्ध
जहाँ गंगा भी मंथर गंभीर गति बहती है
इसे रससिक्त करती है, होती है
तुम भी
इसकी ध्वनियों और रंगों को
धीरे-धीरे पहचानना
हवा के तेज झोकें की तरह
गुजर मत जाना दोस्त !
घाटों पर बैठना
सीढियों से बतियाना
अपने देश/शहर का हाल-चाल बताना
पूर्वी ठसक से गर्वोन्नत
यह शहर सिर्फ बतकहियों में ही रस नहीं लेता
ज्ञान, कला और संस्कृति के
भारत के इस मुखपत्र को
तुम्हारे देश में हुए/हो रहे
नवीन अन्वेषणों के बारे में बताना
यह कुछ नए आयाम जोड़ेगा
कुछ अपनी सुनाएगा .
प्राचीनतम भब्यता और
आधुनिकतम ज्ञान-स्फूर्ति से छलछलाता
यह मस्त, बेबाक शहर
अपनी मलंग उदारता के साथ
तुम्हें अपनाएगा
बार-बार बुलाएगा.
तुम जब-जब बनारस जाना
इसे मेरी याद दिलाना.
-- सुमीता
सोमवार, 29 नवंबर 2010
सोमवार, 1 नवंबर 2010
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
पंडित विश्व मोहन भट्ट को सुनते हुए
फौलादी तारों पर खुरच कर
मोहिनी वाणी में तुम
लिखते/ रचते हो जो
उसे सुनना
आकाश होना है
स्वरों की गंगोत्री में पलकें धो
आत्मा की स्वर्णिम परतें खोलना है
भीतर के शून्य का
बाहर के शून्य में मिलना
अस्तित्व का अनंत में घुलना है.
-- सुमीता
मोहिनी वाणी में तुम
लिखते/ रचते हो जो
उसे सुनना
आकाश होना है
स्वरों की गंगोत्री में पलकें धो
आत्मा की स्वर्णिम परतें खोलना है
भीतर के शून्य का
बाहर के शून्य में मिलना
अस्तित्व का अनंत में घुलना है.
-- सुमीता
आवाज़ हो रही है झीनी-झीनी ...
आवाज़ हो रही है झीनी-झीनी ...
कलाबाज कलावंत !
तने आलाप पर अनगिन भावमुद्राओं में
थिरकती तुम्हारी आवाज़ का अचम्भा
थोड़ी सी ढील देकर स्वर तार का
अचके खींचना
खींच लेना ध्यान.
केन्द्रस्थ सूर्य के गिर्द
जैसे थिरकते हैं ग्रह-नक्षत्र...
अपनी गूंज की धूरी पर
नाजुक कमनीयता के साथ
जैसे घूमता हो कोई रंगीन लट्टू...
या सौ सौ रंग रंगी तुम्हारी तिलंगी
जटिल उलझी अपने ही रास्ते बुनती
वलयाकार सम्मोहक
गतियाँ अनूठी
कैसी कैसी पेंचे
कितना नट कौशल
परिशुद्ध सधाव का सधा संतुलन !
चाहे जितना भी चक्कर काटते
कहीं भी घूम आते तुम सम पर ही
ठहरते हो कैसे ?
विकृत विवादी भी सुन्दर होते हैं इतने ?!
तुम्हारी लटाई में कितने आवर्तन हैं गायक ?
"बाकटी उस्ताद !"
कटता है अहम्
गलता है ह्रदय
अप्रतिम सुख का अन्तराल...
अस्तित्व : हवा के पंखों पर उड़ती
सेमल की रुई
निरभ्र गगनमंडल में ठहरी चौदस की चांदनी
आवाज़ हो रही है झीनी-झीनी...
-- सुमीता
कलाबाज कलावंत !
तने आलाप पर अनगिन भावमुद्राओं में
थिरकती तुम्हारी आवाज़ का अचम्भा
थोड़ी सी ढील देकर स्वर तार का
अचके खींचना
खींच लेना ध्यान.
केन्द्रस्थ सूर्य के गिर्द
जैसे थिरकते हैं ग्रह-नक्षत्र...
अपनी गूंज की धूरी पर
नाजुक कमनीयता के साथ
जैसे घूमता हो कोई रंगीन लट्टू...
या सौ सौ रंग रंगी तुम्हारी तिलंगी
जटिल उलझी अपने ही रास्ते बुनती
वलयाकार सम्मोहक
गतियाँ अनूठी
कैसी कैसी पेंचे
कितना नट कौशल
परिशुद्ध सधाव का सधा संतुलन !
चाहे जितना भी चक्कर काटते
कहीं भी घूम आते तुम सम पर ही
ठहरते हो कैसे ?
विकृत विवादी भी सुन्दर होते हैं इतने ?!
तुम्हारी लटाई में कितने आवर्तन हैं गायक ?
"बाकटी उस्ताद !"
कटता है अहम्
गलता है ह्रदय
अप्रतिम सुख का अन्तराल...
अस्तित्व : हवा के पंखों पर उड़ती
सेमल की रुई
निरभ्र गगनमंडल में ठहरी चौदस की चांदनी
आवाज़ हो रही है झीनी-झीनी...
-- सुमीता
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