शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कविता

कविता

बेस्वाद कौर 
और
आँखों के   पानीदार कोरों
में झिलमिलाते सपनों की
ताबीर का सलीका है
कविता

-- सुमीता

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

jalasaaghar: सामान्यतः

jalasaaghar: सामान्यतः

सामान्यतः


दूसरे की खूबियों पर मुग्ध होते 
बलि-बलि जाते 
अपने अहम् का विसर्जन करते 
(जब हम समझते हैं 
कि प्रेम में हैं)
हम स्वयं को भूलने लगते हैं.

दूसरे की खामियों को 
स्वीकारते, पचाते 
(यानी उदारता का अभ्यास करते)
हम दूषित, विषैले होते जाते हैं.

दूसरे की गलतियों की सजा 
खुद को देते
- हम मरने लगते हैं.

-- सुमीता



jalasaaghar: मित्रधन

jalasaaghar: मित्रधन

jalasaaghar: मित्रधन

jalasaaghar: मित्रधन

मित्रधन


   मित्रधन

जो पाया, जो खोया
सहेजा, संजोया
उनमें
जो कुछ मोल मिला
सब माटी का ठीकरा
मित्रधन बस
अनमोल ठहरा.

बंधु मेरे ! हमारी पहचान के बल
लम्बे वर्षों के पार से
दी जो दस्तक
पहचान ही लेगी तुम्हारी चेतना
अपने पुराने गाँव/शहर की
मिट्टी की सोंधी खुशबू ,
हवा और पानी के उसी ताज़गी भरे
स्वाद की तरह
जिसकी हम निर्मिति हैं.

-- सुमीता  


शनिवार, 11 दिसंबर 2010

ईश्वर- तुमसे

द्रुत गति, चंचल  ...
या धीर, सधे कदम ...
या हांफते, कराहते, डगमगाते
केवल मुझे ही आना हो तुमतक
तो
तुम ईश्वर ही सही
नहीं मुझे कबूल
तुम्हारी दोस्ती.

अपनी अघट ऊर्जा, श्रमशक्ति, मेधा
प्राणों की बिजली और अक्षरा आस्था के
पंचमहाभूतों से
रच लूंगी अपना सुन्दर संसार
पृथ्वी और आकाश.

केवल तुम ही नहीं
रचयिता-
मैं भी तो हूँ.

-सुमीता