मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सामान्यतः


दूसरे की खूबियों पर मुग्ध होते 
बलि-बलि जाते 
अपने अहम् का विसर्जन करते 
(जब हम समझते हैं 
कि प्रेम में हैं)
हम स्वयं को भूलने लगते हैं.

दूसरे की खामियों को 
स्वीकारते, पचाते 
(यानी उदारता का अभ्यास करते)
हम दूषित, विषैले होते जाते हैं.

दूसरे की गलतियों की सजा 
खुद को देते
- हम मरने लगते हैं.

-- सुमीता



jalasaaghar: मित्रधन

jalasaaghar: मित्रधन

jalasaaghar: मित्रधन

jalasaaghar: मित्रधन

मित्रधन


   मित्रधन

जो पाया, जो खोया
सहेजा, संजोया
उनमें
जो कुछ मोल मिला
सब माटी का ठीकरा
मित्रधन बस
अनमोल ठहरा.

बंधु मेरे ! हमारी पहचान के बल
लम्बे वर्षों के पार से
दी जो दस्तक
पहचान ही लेगी तुम्हारी चेतना
अपने पुराने गाँव/शहर की
मिट्टी की सोंधी खुशबू ,
हवा और पानी के उसी ताज़गी भरे
स्वाद की तरह
जिसकी हम निर्मिति हैं.

-- सुमीता  


शनिवार, 11 दिसंबर 2010

ईश्वर- तुमसे

द्रुत गति, चंचल  ...
या धीर, सधे कदम ...
या हांफते, कराहते, डगमगाते
केवल मुझे ही आना हो तुमतक
तो
तुम ईश्वर ही सही
नहीं मुझे कबूल
तुम्हारी दोस्ती.

अपनी अघट ऊर्जा, श्रमशक्ति, मेधा
प्राणों की बिजली और अक्षरा आस्था के
पंचमहाभूतों से
रच लूंगी अपना सुन्दर संसार
पृथ्वी और आकाश.

केवल तुम ही नहीं
रचयिता-
मैं भी तो हूँ.

-सुमीता

सोमवार, 29 नवंबर 2010

बनारस को मेरी याद दिलाना

बनारस को मेरी याद दिलाना
मेरे परदेशी दोस्त !

हर उस ठाव पर जाना
जहाँ हमने कवितायें पढी
बहसें कीं, गीत गुनगुनाएं
 जीवन के शतरंगों से बुने
ताजा और जीवंत वे क्षण
तुमसे हाथ मिलायेंगे.
उस पुरातन शहर के
एक और रस से
तुम्हारा परिचय करवाएंगे.
धरती के एक हिस्से पर
अपनी सभी हरी शाखों के साथ
तने खड़े पेड़ की जड़ें
कितनी गहरी और दूरस्थ हैं
इसकी झलक दिखलायेंगे.

अपनी लहरीली तीव्रता के विरुद्ध
जहाँ गंगा भी मंथर गंभीर गति बहती है
इसे रससिक्त करती है, होती है
तुम भी
इसकी ध्वनियों और रंगों को
धीरे-धीरे पहचानना
हवा के तेज झोकें की तरह
गुजर मत जाना दोस्त !
घाटों पर बैठना
सीढियों से बतियाना
अपने देश/शहर का हाल-चाल बताना
पूर्वी ठसक से गर्वोन्नत
यह शहर सिर्फ बतकहियों में ही रस नहीं लेता
ज्ञान, कला और संस्कृति के
भारत के इस मुखपत्र को
तुम्हारे देश में हुए/हो रहे
नवीन अन्वेषणों के बारे में बताना
यह कुछ नए आयाम जोड़ेगा
कुछ अपनी सुनाएगा .
प्राचीनतम भब्यता और
आधुनिकतम ज्ञान-स्फूर्ति से छलछलाता
यह मस्त, बेबाक शहर
अपनी मलंग उदारता के साथ
तुम्हें अपनाएगा
बार-बार बुलाएगा.

तुम जब-जब बनारस जाना
इसे मेरी याद दिलाना.

-- सुमीता