शनिवार, 2 नवंबर 2013

दिल का मौसम सर्द बहुत है

दिल का मौसम सर्द बहुत है, बाकी तो सब अच्छा है
एक तुम्हारी कमी है यारा, बाकी तो सब अच्छा है

देहरी, आँगन, तुलसी चौरे, धरा दीप है माटी का
मेरी साँसें तेरा सुमिरन, बाकी तो सब कच्चा है

जंगल-सहरा-पर्वत-दर्रे, मारी फिरी मैं, हुई हलकान
एक भरम तू, एक छलावा, बाकी तो रब सच्चा है 

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

देह की कब्र के परे

जैसे भोथरा लोहा भी
आघात सहते-सहते 
हो जाता है धारदार
ठीक वैसे ही मेरी चेतना का
धातु भी पिघलकर,
मंज-मंज कर बन गया है आईना
प्रशांत जल की सतह-सा।

मेरी देह की घुप्प कब्र में उतरने से पहले
तुम साक्षात् देख सकते हो खुद को
वैसे खतरे तमाम हैं इसमें
(इसलिए तुम ऐसा कोई उपक्रम करते भी नहीं):

तुम्हारे अहम् को तुष्ट करने वाली कोई भी झलकी
नहीं दिखेगी इसमें
उलटे सत्य की कड़वाहट
एक तीक्ष्ण तिक्तता से भर सकती है तुम्हें
और रोषभरी एक नाउम्मीद झल्लाहट में
तुम सगुन-निर्गुण की बेहिसाब व्याख्याओं
और मेरे अस्तित्व की धज्जियाँ उड़ाने में
ऐसी तन्मयता से उलझ जाओगे कि
संसार चकित-विस्मित हो झूमा करेगा
तुम्हारे ज्ञान-कैशल और वाक्-चातुरी की प्रतिभा के हिंडोले में,
या तुम प्रेम-प्रयोग के नाम पर
प्रेम-याचना में भटकोगे रंगोली सजी
लुभावनी देहरी-देहरी-
मुझपर अकारण दोष मढ़ते हुए।

असंभव तुम्हारा रुकना!

यह जानते हुए भी कि
घुप्प अंधियारे का रंग
एक ही होता है हमेशा और
मन का अँधियारा देह के अँधियारे से भी
होता है गहनतर ...
हृदय में एक कणी सी उतर आने वाली
रोशनी की राह
नहीं खुलती वहाँ।

अपने मासूम दुराग्रहों की लगातार
व्यर्थ चाबुक फटकारते भीषण थके हुए-
तुम्हें विश्राम चाहिए।

सच की छेनी से छांटे-तराशे जाने की अकुलाहट
पैदा हो जाए तब आ जाना मुक्ति का स्वाद लेने
उड़ती सेमल की रुइयों से भी हल्की मखमली
प्रकृति की कोमलतम गोद में तुम्हारा स्वागत होगा पुरुष!
अन्यथा
ऐ मेरी निर्मिती!
जन्मों-जन्मों का तुम्हारा बेचैन भटकाव
मुझे नहीं होने देगा मुक्त
जबकि मुझे अपनी देह की कब्र के परे
जाने के रास्ते का पता मिल गया है।

--सुमीता

27/10/13 

Philosophy and beyond the Philosophy

At that very point Where the abstraction of all the art-forms and aesthetics seems to conclude, Mathematics emerges just from there. So abstract in nature, Mathematics is a profound and subtle art form of all the sciences. Simpler and complicated patterns, forms and designs scattered throughout in the nature and in our surroundings speak a lot about it. Mathematics is the way of life for the omnipresent, the creator of the universe, the greatest mathematician. Mathematics is the philosophy and beyond the philosophy.  It’s like a reservoir of infinite beauty which captivated every sensitive human being since they came into being on earth. And since then human race tried and tried frequently to recreate this beauty, in any or many forms of arts and aesthetics. But they are utterly bounded in the frame of “recreation”.

The beauty of mathematics can be seen and felt everywhere and in every instance of life. The beauty lies in its pious detachment. So the amusement of a creation is certainly related to the degree of detachment. Higher the detachment implies stupendous creative satisfaction. Mathematics is the most intriguing language of detachment.  It is the language of freedom, enlightment, bliss and nirvana. 

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

तुम्हारे साथ

निवात निष्कंप जलती दीये की लौ
सूरज हो गई है
तुम्हारे हर सफर के लिए।
तुम्हारे हाथों में थमी
आग में सिंझी कलाई
बन गई है
पकाए गए लोहे का धारदार हथियार।
मीत मेरे, तुमपर टिकी मेरी ध्यानस्थ चेतना
प्रशांत नदी सी अहर्निश बह रही है तुम्हारे साथ-साथ- निःशंक, निर्भीक।
युद्ध हो या शांति विजय होगी निश्चित ही।

शनिवार, 29 जून 2013

Primordial Composition

I am hearing the duet of
Einstein’s theory of relative space
and uday Bhawalkar’s Drupad
resonating with each-other
in the infinite tranquility of universal rhythm
so primordial 
so profound...

As primeval as the streams of blood
running in our veins.

Sumita
29/06/2013

बुधवार, 22 अगस्त 2012

न्यूटन

सागर तट पर
सबसे चिकना पत्थर या
सबसे सुन्दर सीप
खोजने में तल्लीन
विस्मय भरी तुम्हारी अंगुलियाँ
पारे से दंशित हो जाती रहीं ...

जगतजननी की गोद बैठे
रोष भरे बालक!
तुम (प्रकृति के) कैसे शिशु थे ?
वह अपना सारा वैभव, सारे रहस्य
तुमपर
करती रही निछावर
और उम्रभर
तुम करते रहे नफ़रत
कि माँ की छाया भर
छू लेने को आकुल
दूरस्थ चर्च के माथे जड़े क्रॉस के
तीन सिरों पर ध्यानस्थ तुम्हारी चेतना
ईश के त्रिविध-त्रिरूप
को गुपचुप धता बताती
ही रही...

जैसे किसी उद्धत-उद्दंड खरगोश के बच्चे को
मिल गयी हो
शेर की झलक-
सहमे और भयभीत तुम
हठ में या आत्मरक्षा में
जाने किस-किस के विरुद्ध
चौतरफा
बेआवाज़ तर्कों के धारदार हथियार भाँजते हुए भी 
पवित्र आदेशों की
कर न सके अवहेलना.
(ईश्वर के प्रति जब-जब खंडित हुई तुम्हारी आस्था
मानसिक आघातों ने द्वार खटखटाया.)
 

तुम तन्मय मौन के नीरव एकांत में
उतर गए
तर गए
.

धरती के भीतर का दुर्निवार आकर्षण
एक सेव भर के गिरने से
समझ सकने वाले !

अपनी माता के भरे-पूरे स्त्रीत्व के
सहज मानवीय उत्कंठित आकर्षण को
आजीवन कैसे रहे नकारते ?

कि ब्रह्मचारी बने रहने की
भीष्म प्रतिज्ञा के साथ ही
स्त्री प्रजाति से घृणा करने का
पुरुषोचित अधिकार आरक्षित कर लिए
?
यह जिद्दी दुराग्रह मात्र 
क्या
तुम्हारी मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला
के किसी प्रयोग का निकष था-
अँधियारे और उजाले के क्रमिक सह-अस्तित्व की तरह ?!
तुम्हारी सत्यान्वेषी उद्दात कुशाग्रता और
(आलोचकों के प्रति)
क्रूर अनुदारता के (बे)मेल की तरह ?!

सत्य के संधान को एकाग्र तुम्हारी
अतिन्द्रिय अंतर्दृष्टि
शाश्वत सर्वज्ञ का
तुम्हें दिया गया अनमोल उपहार था.
सार्वकालिक गणितज्ञ के स्पंदनों से
सीधे जुड़े मनस्वी ब्रह्मऋषि!
तुम्हारी अचूक सूझ
तुम्हारी सतत साधना की
नायाब परिणति थी .

खगोलीय पिंडों के आपसी तनाव
और सप्तरंगी प्रकाश के बीच जारी
अनवरत लुकाछिपी
के अद्वितीय साक्षी !
आधुनिक वैज्ञानिक क्रांति के अग्रदूत !
तुम्हारे भगीरथ प्रयत्नों से
लहालोट
हुईं धरती की वैज्ञानिक संवेदनाएं
और साकार होने लगीं मनुष्य की अतिरंजित कलपनाएँ .

आधुनिक वैज्ञानिक जगत के परम पुरखे!
तुम्हारी उपलब्धिओं से उपकृत
तुम्हारे मस्तिष्क की कीमिया
समझने का प्रयास करती
पीढ़ियाँ
तुम्हारी ही अँगुली थामकर
चलीं .


न्यूटन !
हम नमन करते हैं तुम्हारा
और प्रार्थना भी
तुम फिर से उतर आओ पृथिवी पर
प्रकृति के मोद भरे बालक की तरह.

--सुमीता

मंगलवार, 5 जून 2012

अर्थ मंद समय- 2


बीमार पड़ना 
सबसे बड़ी अय्यासी है 
कमजोर दीख जाना 
जीवन के पावों पर खुद मारी गयी कुल्हाडी है
भीषण अर्थ मंद समय की 
विपदा भारी है
कहाँ जाएँ, क्या करें 
आर्तनाद जारी है.
-- सुमीता